नई शिक्षा नीति पर अंग्रेजी भाषा को माध्यम न मानने पर, इसके क्या सकारात्मक व नकारात्मक परिणाम होंगे?


वर्तमान में लागू की गई नई शिक्षा नीति में अंग्रेजी भाषा को मुख्य माध्यम नहीं मानने से ज्यादा, मैं इस सवाल पर आप लोगों का ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा, कि नई शिक्षा नीति में “त्रिभाषा प्रणाली” को क्यों अनिवार्य नहीं किया गया?

    यह प्रश्न पूछा जाना इसलिए वाजिब है, क्योंकि "त्रिभाषा प्रणाली" में एक अंतरराष्ट्रीय, एक राष्ट्रीय और एक क्षेत्रीय भाषा का समावेश होता है | यदि आप इतिहास में रुचि रखते हैं, तो यह बात ग़ौरतलब होगी कि, जिन 53 देशों को इंग्लैंड ने अपना उपनिवेश बनाकर अपने अधिपत्य रखा था, कालांतर में एक के बाद एक सभी देश स्वतंत्र होकर नवस्वाधीन देश के रूप में रूपांतरित हो गए | उन नवस्वाधीन देशों में अप्रत्यक्ष रूप से अपना प्रभुत्व एवं नियंत्रण बनाए रखने के लिए ब्रिटिश हुक़ूमत ने एक नीति बनाई | जिसके अंतर्गत अपना देश भारत भी सन 1947 में राष्ट्रमंडल का सदस्य बन गया | इस नीति के तहत स्वाधीन होने के बावजूद भारत की शासन और प्रशासन की भाषा के रूप में अंग्रेजी भाषा को मान्यता मिली | इसके बाद से अंग्रेजी भाषा भारतीय शिक्षा प्रणाली का अभिन्न अंग बन गई |

    इसके सारे सकारात्मक एवं नकारात्मक परिणामों के बारे में काफी बातें साथियों ने बताई हैं | जैसे - मातृभाषा या स्थानीय भाषा के उपयोग से बच्चों के मानसिक एवं शैक्षणिक विकास में सकारात्मक प्रभाव पड़ना आदि | वर्तमान शिक्षा प्रणाली विद्यार्थियों द्वारा कोर्स को रट लेने एवं शिक्षकों द्वारा शैक्षणिक अवधि में किसी भी तरीके से पाठ्यक्रम (सिलेबस) को पूरा करने तक ही सीमित है | अंग्रेजी भाषा में पर्याप्त पकड़ ना होने के अभाव में विद्यार्थीगण कई विषयों के आधारभूत विषयवस्तु को पूर्णतः नहीं समझ पाते और हीनग्रंथि का शिकार होने के कारण परीक्षा में यथोचित सफलता से वंचित हो जाते हैं | दरअसल मैं स्वयं कंप्यूटर शिक्षा से जुड़ा हूं, जिसमें अंग्रेजी भाषा की समझ बुनियादी रूप से कंप्यूटर शिक्षण में सहायक होती है, अंग्रेजी भाषा की बेहतर जानकारी और समाज ना रहे तो निश्चित रूप से आपको काफी समस्याओं से जूझने पड़ सकता है | हालांकि आज बहुत से वेबसाइट हिंदी में ही सवाल - जवाब, सलाह - मशविरा एवं जानकारियाँ प्रदान करते हैं | इन सब से मिलने वाले सहयोग के चलते हैं कंप्यूटर का उपयोग प्रारंभिक तौर पर जरा आसान हो गया है |

    अनेकों शिक्षा आयोगों के गठन और उनके द्वारा प्रस्तावित नीतियों की उपेक्षा, शिक्षा के क्षेत्र में बार-बार प्रयोग और बदलावों ने कई तकनीकी समस्याएं उत्पन्न की हैं | ऐसे ही तमाम समस्याओं की वजहों से से वैश्विक स्तर पर भारत, शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा माना जाता है | शैक्षणिक क्षेत्र में राजनीतिक दखल और नौकरशाही ने शिक्षा का सत्यानाश किया है | साक्षर होने एवं शिक्षित होने में ज़मीन आसमान का फर्क होता है | देश में चल रहे साक्षरता अभियान को इस दृष्टिकोण से विश्लेषित किया जा सकता है | समाजशास्त्रियों ने अंग्रेजी भाषा को शोषक और शासक की भाषा की संज्ञा दी हुई है | उसी संदर्भ में देसी भाषा हिंदी आदि को शोषित और शासित की भाषा माना जाता है |

    आज अधिकांश उच्च स्तरीय शिक्षा अंग्रेजी भाषा में इंटरनेट के जरिए प्रचारित और प्रसारित हो रहे हैं | जो देश कॉमनवेल्थ के सदस्य नहीं भी हैं, वह भी अंग्रेजी भाषा के दबाव में हैं और उसे अपनाने के लिए विवश है | विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में कई देशों की अपनी भाषा में पहुंच नहीं है, ना किताबें हैं और ना ही शोध ग्रंथ | इसके अभाव में उनकी स्थिति को समझा जा सकता है | चीन, जर्मनी, फ्रांस, रूस, आदि बड़े और उन्नत तकनीकी संपन्न देश अंग्रेजी भाषा की दासता से मुक्त है और वे अपने देश की भाषा में विकसित हुए हैं | तब भी अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य व्यापार के दृष्टिकोण से वहां अभी अंग्रेजी सीखने के आग्रह में वृद्धि हुई है | जिनमें से कुछ दक्षिण - एशियाई देश भी शामिल हैं |

    छत्तीसगढ़ शासन मैं अंग्रेजी भाषा के महत्व को समझते हुए 40 सरकारी विद्यालयों को अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में बदला गया है | जिसके चलते सभी विषयों के अध्यापन हेतु अंग्रेजी भाषा में प्रवीण शिक्षकों की भारी मांग है | इससे सामान्य आर्थिक वर्ग के छात्रों एवं उनके पालकों को काफी फायदा होगा | राष्ट्रीय एकता के नाम पर हिंदी भाषा का महत्व जरूर है, लेकिन उतना ही महत्व दक्षिण राज्यों की क्षेत्रीय भाषा है | अन्यथा दक्षिण में हिंदी विरोध जैसी राजनीतिक बातें राष्ट्रीय एकता में बाधक होंगी | साल में एक दिन ”हिंदी दिवस” और बाकी के 364 दिन अंग्रेजी दिवस का आलम रहता है | ग़ुलाम मानसिकता वाले देश का ऐसा ही हश्र होता है |

    हमारा देश अध्यात्म के क्षेत्र में अग्रणी माना जाता है | हिंदू धर्म के सारे ग्रंथ, वेद, उपनिषद्, आरण्यक, ब्राह्मण संहिता, गुहयसूत्र, महाभारत, पुराण, रामायण, सभी संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं | रामचरित मानस अवधि भाषा में और अन्य ग्रंथ ब्रज, मैथिली, भोजपुरी, आदि भाषा में रचित है | इसलिए आज जिस राष्ट्रीय एकता की बात हिंदी भाषा के साथ जोड़ी जाती है, उसके लिए जरूरी है, उच्च स्तरीय साहित्य सृजन के साथ - साथ विज्ञान एवं तकनीक के क्षेत्र में भी विश्वस्तरीय ग्रंथ लिखे जाएं | इसके लिए देश के विख्यात वैज्ञानिक एवं तकनीकी क्षेत्र में दक्ष विद्वान सामने आकर अपने राष्ट्रीय कर्तव्य का निर्वहन करें | जिसके लिए उन्हें शासन द्वारा पर्याप्त सुविधा प्रदान किया जाए | फिर चाहे वह प्रकाशन की हो या प्रचार प्रसार की |

    महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों को भाई भतीजावाद और रिश्वत से परे रखकर अध्यापकों आचार्य की नियुक्ति हो, तथा दलगत राजनीति का दखल ना हो, तभी शैक्षिक जगत का वातावरण एकेडमिक बनेगा | किसी भी भाषा के प्रति दुराग्रह ना हो, जो भी भाषा शिक्षण - प्रशिक्षण - शोध - अनुसंधान में उपयुक्त हो | जिसे शिक्षक और शोधकर्ता के साथ-साथ छात्रों को समझने में सहजता हो | वह भाषा अपने गुणवत्तापूर्ण रचना से देश और समाज को उन्नत बन सकती है | मेरिट के साथ कहीं भी समझौता नहीं होना चाहिए |

उम्मीद है, आपको मेरा यह पोस्ट पसंद आया होगा |

    इस आलेख को पूरा पढ़ने के लिए मैं आप सभी पाठकगणों को धन्यवाद देना चाहता हूँ | यदि आप चाहें तो अपने रिएक्शन, मेरे अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर दे सकते हैं | उन सबके लिंक नीचे प्रदान किये गए हैं -
आपका अपना मित्र,
हिमांशु गोस्वामी



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